बिहार। राज्य के कई इलाकों में टिड्डियों के दल ने फसल और पेड़-पौधों पर हमला बोल दिया है। बिक्रमगंज के कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान ने सूचना देते हए जानकारी की करोड़ों की संख्या में टिड्डों का दल बिक्रमगंज से आगे हसन बाजार व कातर / पीरों की तरफ बढ़ता हुआ देखा गया है। उत्तर प्रदेश से सटे बिहार के जिलों में टिड्डियों के पहुंचने की सूचना पर कृषि मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से खुद आपात बैठक की। पौधा संरक्षण विभाग को विशेष हिदायत दी। कृषि मंत्री ने बताया कि टिड्डियों को भगाने के उपाय किए जा रहे हैं। कीटनाशक छिड़की जा रही हैं। कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार की सतर्कता की वजह से दो दिन पहले रोहतास एवं कैमूर जिले में टिड्डियों के हमले से फसलों को बचा लिया गया है। अब दूसरे दल ने यूपी की ओर से बिहार में प्रवेश की कोशिश की है।

मृत टिड्डा

क्या है टिड्डा
टिड्डा दो से ढाई इंच लम्बा कीट होता है। यह डरपोक होने के कारण समूह में रहते हैं। टिड्डी दल किसानों का सबसे बड़ा शत्रु है। यह एक दिन में 100 से 150 किलोमीटर की दूरी तय कर सकती हैं। झुंड में यह पेड़-पौधे एवं वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह दल 15 से 20 मिनट में फसल के पत्तियों को पूर्ण रूप से खाकर नष्ट कर सकते हैं। टिड्डी दल किसी क्षेत्र में शाम 6 से 8 बजे के आस-पास पहुंचकर जमीन पर बैठ जाते हैं। या फिर पेड़ों, झाडिय़ों एवं फसलों पर बसेरा करते हैं। वहीं पर रात गुजारते हैं तथा फसल को खाकर नुकसान पहुंचाते। फिर सुबह 8 से 9 बजे के करीब उड़ान भरते हैं। अंडा देने की अवधि में इनका दल एक स्थान पर 3 से 4 दिन तक रुक जाता है। हालांकि इनके आगे बढऩे की दिशा हवा की गति पर निर्भर है।

टिड्डियाॅसर्वभक्षी कीटों की श्रेणी में आती हैं,जो किसी भी पौधे को नुकसान पहुंचा सकता है। लगभग दो-ढाई इंच लंबा यह कीट कुछ ही घंटों में फसलों को चट कर जाते हैं। टिड्डी दल किसी क्षेत्र में प्राय: शाम छह बजे से आठ बजे के आसपास पहुंच कर जमीन पर बैठ जाते हैं और रात में फसल को तहस-नहस कर देते हैं। इनको किसान सामुहिक रूप से गांव व क्षेत्र में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग कर भगा सकते हैं। इसके अलावा आग जलाने, पटाखे फोडऩे, थाली, टीन पीटने, ढोल व नगाड़े बजाने से भी ये भाग जाते हैं। तेज ध्वनि को ये कीट बर्दाश्त नहीं कर पाते।

इन रसायनों का करें छिड़काव करें
फसलोंं में यदि टिड्डियों को प्रकोप बढ़ गया हो तो कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव करके भी इनकों मारा जा सकता है। टिड्डी प्रबंधन हेतु फसलों पर नीम के बीजों का पाउडर बनाकर 40 ग्राम पाउडर प्रति लीटर पानी में घोल कर उसका छिड़काव किया जाय तो दो-तीन सप्ताह तक फसल सुरक्षित रहती है। इसके अलावा बेन्डियोकार्ब 80 प्रतिशत 125 ग्राम या क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ईसी 1200 मिली या क्लोरपाइरीफास 50 प्रतिशत ईसी 480 मिली या डेल्टामेथरिन 2.8 प्रतिशत ईसी 625 मिली या डेल्टामेथरिन 1.25 प्रतिशत एससी 1400 मिली या डाईफ्लूबेनज्यूरॉन 25 प्रतिशत डब्ल्यूपी 120 ग्राम या लैम्ब्डा-साईहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी 400 मिली या लैम्ब्डा-साईहेलोथ्रिन 10 प्रतिशत डब्ल्यूपी 200 ग्राम को 500-600 लीटर पानी मे घोल कर प्रति हैक्टेयर अर्थात चार बीघा खेत मे छिड़काव करना होगा। इससे इनके प्रकोप को न सिर्फ कम किया जा सकता है बल्कि उन्हें भगाया भी जा सकता है।
टिड्डी झुंड में रहने पर बहुत खतरनाक व आक्रामक होती हैं। हजारों मील उड़ान की क्षमता वाले टिड्डियों के दल एक दिन में लगभग 100 से 150 किमी तक उड़ सकते हैं। टिड्डी दल हरी फसलों, सब्जी फसल, बाग-बगीचों में एक साथ झुंड के रूप में बैठकर पत्तियों को नष्ट कर देती है और कुछ ही घंटों के आक्रमण में फसल को पूरी तरह से बरबाद कर देती है। अपने वजन के बराबर खाना खाने वाली टिड्डी फसलों का एक बार में सफाया कर देती है।

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